नई दिल्ली - उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को पश्चिम बंगाल में मदरसों के लगभग 360 शिक्षण और गैर - शिक्षण कर्मचारियों द्वारा दायर याचिकाओं के एक समूह को खारिज कर दिया, जिसमें राज्य सरकार की सहायता अनुदान योजना के तहत नियमितीकरण और भुगतान से इनकार को चुनौती दी गई थी ।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ए. जी. मसीह की पीठ ने ऐसे 350 से अधिक कर्मचारियों में से 13 याचिकाकर्ताओं के मामलों की जांच करने के बाद यह फैसला सुनाया कि क्या राहत देने के लिए कोई मामला बनाया गया था ।
पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा,'हम इस आधार पर आगे बढ़े कि अगर इन 13 याचिकाकर्ताओं में से कोई एक हमें अपने पक्ष में ठहराने के लिए राजी करता है तो हम शेष मामलों की भी जांच करेंगे । दुर्भाग्य से 13 याचिकाकर्तियों में से कोई भी हमें प्रभावित नहीं कर सका । सभी याचिकाओं को खारिज करते हुए पीठ ने कहा,'इसलिए हमने न केवल उन सभी 13 याचिकाकारों के दावों को खारिज कर दिया है, जिनके मामलों की जांच की गई थी, बल्कि शेष सभी याचिकाकर्ताओ के दावों को भी अस्वीकार कर दिया है । सभी रिट याचिकाएं योग्यता से रहित हैं और तदनुसार खारिज कर दी जाती हैं ।'पश्चिम बंगाल के विभिन्न मदरसों में कार्यरत लगभग 360 शिक्षण और गैर - शिक्षण कर्मचारियों ने शीर्ष अदालत में लगभग 48 याचिकाएं दायर की थीं ।
यह विवाद पश्चिम बंगाल मदरसा सेवा आयोग अधिनियम 2008 से संबंधित है जिसने मान्यता प्राप्त मदरसों में शिक्षकों की नियुक्तियों की सिफारिश करने के लिए एक वैधानिक आयोग का गठन किया था ।
2014 में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 2015 में अपनी खंड पीठ द्वारा बरकरार रखे गए एक फैसले को रद्द कर दिया ।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2016 में फैसले पर रोक लगा दी ।
फरवरी 2023 में शीर्ष अदालत ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के 2015 के फैसले के बाद की गई नियुक्तियों की वैधता निर्धारित करने के लिए एक समिति का गठन किया, लेकिन शीर्ष अदालत के 2020 के फैसले से पहले 2008 के अधिनियम को बरकरार रखा ।
समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें ऐसी नियुक्तियों को अमान्य पाया गया । पीड़ित कर्मचारियों ने तब समिति के निष्कर्षों को शीर्ष अदालत में चुनौती दी ।
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